जीने की कला
जीना भी एक कला है लेकिन कला नहीं तपस्या है जियो तो प्राण डाल दो जिंदगी में डाल दो जीवन रस के उपकरणों में ठीक है लेकिन क्यों क्या जीवन के लिए जीना ही बड़ी बात है सारे संसार अपने मतलब के लिए ही तो जी रहा है याग वल्लव के बहुत बड़े ब्रह्म वादी ऋषि ऋषि थे उन्होंने अपनी पत्नी को विश चित्र भाव से समझने की कोशिश की कि सबकुछ स्वस्थ स्वार्थ के लिए है पुत्र के लिए पुत्र कीजिए नहीं होता पत्नी के लिए पत्नी पूरी नहीं होती सब अपने मतलब के लिए होते हैं आत्मन अस्तु का माय सर्वोपरि बहुत ही विचित्र नहीं है यह तर्क संसार में जहां कहीं प्रेम है सब मतलब के लिए सुनाएं पश्चिम के विचार को ने भी ऐसी बात कही है सुनकर हैरानी होती है दुनिया याद नहीं है नहीं है नहीं है परमार्थ नहीं है केवल स्वार्थ भीतर की जिजीविषा जीतने की इच्छा की ही अगर बड़ी बात हो तो फिर यह सारी बड़ी-बड़ी बोलियां जिनके बनाए जाते हैं शत्रु मर्द का अभिनय किया जाता है का नारा लगाया जाता है साहित्य और कला की महिमा गाई जाती है झूठ है इसके द्वारा कोई न कोई अपना स्वार्थ सिद्ध करता है लेकिन अंतर अंतर से कोई कह रहा है ऐसा सोचना गलत ढंग से सोचना है स्वार्थ से भी बड़े कोई न कोई बात अवश्य जिजीविषा से कोई न कोई शक्ति अवश्य है
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