संस्कृति और राष्ट्रीयता
प्राचीन काल में जब धर्म मजहब समस्त जीवन को प्रभावित करता है था तब संस्कृति के बनाने में उसका भी हाथ था किंतु धर्म के अतिरिक्त अन्य कारण भी सांस्कृतिक कारण में सहायक होते हैं थे आज मजहब का प्रभाव बहुत कम हो गया है अन्य विचार जिस राष्ट्रीयता आंधी उसका स्थान ले रहे हैं राष्ट्रीयता की भावना तो मजहब से ऊपर है हमारे देश में दुर्भाग्य से लोक संस्कृति को धर्म से अलग नहीं करते हैं इसका कारण अज्ञान और हमारे संग रहता है हम पर्याप्त मात्रा में जागरूक नहीं है हमको नहीं मालूम है कि कौन-कौन सी शक्तियां काम कर रही है और इसका विवेचन भी ठीक से नहीं कर पाते हैं कौन सा मार्ग सही है वही देश है जो युग धर्म की अपेक्षा करते हैं और परिवर्तन के लिए तैयार नहीं है परंतु हम आज भी अपनी आंखें नहीं खोल पा रहे हैं परिवर्तन का यह अर्थ कदापि नहीं है अतीत की सर्वथा उपेक्षा की जाइए ऐसा हो नहीं सकता अतीत के व्यस्त जीवन है उनकी तो रक्षा करनी ही है। किंतु नए मूल्यों का हमको स्वागत करना होगा तथा वे आचार विचार जो युग के लिए अनुपयुक्त और हानिकारक है उनका परित्याग भी करना होगा
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